दो0: रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड ।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड ।। ४९ (क) ।।

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ।। ४९ (ख) ।।


दो0: प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि ।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ।। ५० ।।


दो0: सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ।। ५१ ।।


दो0: कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार ।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ।। ५२ ।।


दो0: की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर ।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ।। ५३ ।।


दो0: द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि ।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ।। ५४ ।।