श्री काली स्तुतिः (ब्रह्मा कृतम्) देवी काली की महिमा का वर्णन करने वाली एक दिव्य स्तुति है, जिसका उल्लेख काली रहस्य में प्राप्त होता है। इस स्तुति में भगवान ब्रह्मा माँ काली की स्तुति करते हुए उन्हें आदिशक्ति, महामाया, कालस्वरूपा तथा समस्त सृष्टि की मूल कारण शक्ति के रूप में प्रणाम करते हैं।
इस स्तोत्र में देवी को ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहार शक्ति कहा गया है। ब्रह्मा जी वर्णन करते हैं कि समस्त देवता, ऋषि तथा योगी भी देवी की अनंत महिमा का पूर्ण वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। माँ काली ही जीवों को अज्ञान से मुक्त कर ज्ञान, शक्ति, निर्भयता और मोक्ष प्रदान करती हैं।
काली उपासना में इस स्तुति का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ इसके पाठ से साधक के भीतर देवी के प्रति समर्पण, आत्मबल और आध्यात्मिक जागृति का विकास होता है। विशेष रूप से नवरात्रि, अमावस्या तथा माँ काली की पूजा के अवसर पर इसका पाठ शुभ माना जाता है।
यह स्तुति भक्त को यह अनुभूति कराती है कि माँ काली केवल संहार की देवी नहीं, बल्कि करुणा, संरक्षण, ज्ञान और मुक्ति प्रदान करने वाली परम दिव्य शक्ति हैं।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री काली स्तुतिः (ब्रह्म कृतम्) ॥
॥ श्रीकालीरहस्ये ॥
॥ श्रीब्रह्मा उवाच ॥
नमामि कृष्णरूपिणीं कृष्णाङ्गयष्टिधारिणीम् ।
समग्रतत्त्वसागरं अपारपारगह्वराम् ॥ १ ॥
शिवाप्रभां समुज्ज्वलां स्फुरच्छशाङ्कशेखराम् ।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्तिभास्कराम् ॥ २ ॥
महेन्द्रकश्यपार्चितां सनत्कुमारसंस्तुताम् ।
सुरासुरेन्द्रवन्दितां यथार्थनिर्मलाद्भुताम् ॥ ३ ॥
अतर्क्यरोचिरूर्जितां विकारदोषवर्जिताम् ।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तितां विशेषतत्त्वसूचिताम् ॥ ४ ॥
मृतास्थिनिर्मितस्रजां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम् ।
सुशुद्धतत्त्वतोषणां त्रिवेदपारभूषणाम् ॥ ५ ॥
भुजङ्गहारहारिणीं कपालखण्डधारिणीम् ।
सुधार्मिकौपकारिणीं सुरेन्द्रवैरिघातिनीम् ॥ ६ ॥
कुठारपाशचापिनीं कृतान्तकामभेदिनीम् ।
शुभां कपालमालिनीं सुवर्णकल्पशाखिनीम् ॥ ७ ॥
श्मशानभूमिवासिनीं द्विजेन्द्रमौलिभाविनीम् ।
तमोऽन्धकारयामिनीं शिवस्वभावकामिनीम् ॥ ८ ॥
सहस्रसूर्यराजिकां धनञ्जयोग्रकारिकाम् ।
सुशुद्धकालकन्दलां सुभृङ्गबृन्दमञ्जुलाम् ॥ ९ ॥
प्रजायिनीं प्रजावतीं नमामि मातरं सतीम् ।
स्वकर्मकारणे गतिं हरप्रियां च पार्वतीम् ॥ १० ॥
अनन्तशक्तिकान्तिदां यशोऽर्थभुक्तिमुक्तिदाम् ।
पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहं सुरार्चिताम् ॥ ११ ॥
॥ प्रार्थना ॥
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवि पाहि माम् ।
जयन्ति ते स्तुवन्ति ये शुभं लभन्त्यमोक्षतः ॥ १२ ॥
सदैव ते हतद्विषः परं भवन्ति सज्जुषः ।
जराः परे शिवेऽधुना प्रसाधि मां करोमि किम् ॥ १३ ॥
अतीव मोहितात्मनो वृथा विचेष्टितस्य मे ।
कुरु प्रसादितं मनो यथास्मि जन्मभञ्जनः ॥ १४ ॥
॥ फलश्रुति ॥
तथा भवन्तु तावका यथैव घोषितालकाः ।
इमां स्तुतिं ममेरितां पठन्ति कालिसाधकाः ।
न ते पुनः सुदुस्तरे पतन्ति मोहगह्वरे ॥ १५ ॥
॥ इति श्रीकालीरहस्ये ब्रह्मकृतं श्रीकालीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥