दो0: सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।। ४३ ।।


दो0: उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ।। ४४ ।।


दो0: श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।। ४५ ।।


दो0: तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।। ४६ ।।


दो0: अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ।। ४७ ।।


दो0: सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम ।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।। ४८ ।।