दो0: अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।। ७ ।।


दो0: निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ।। ८ ।।


दो0: आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ।। ९ ।।


दो0: भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ।। १० ।।


दो0: जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ।। ११ ।।


सो0: कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब ।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ ।। १२ ।।