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श्री कृष्ण जी

ब्रह्माण्डपावन श्रीकृष्ण कवच / Shri Krishna Kavach

20 June 2026

॥ ब्रह्मोवाच ॥
राधाकान्त महामाग ! कवचं यत्र प्रकाशितम् ।
ब्रह्माण्ड-पावनं नाम, कृपया कथय प्रभो ॥ १ ॥

मां महेशं च धर्मं च, सन्तं च भक्त-वल्लभम् ।
त्वत्-प्रसादेन भुंजेयो, दायार्हं भक्त-संगतः ॥ २ ॥

॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥
शृणु वक्ष्यामि ब्रह्मन् ! धर्मेण कवचं परम् ।
अहं दारार्तिभिः पूर्णम्, गोपीनां सुखदायकम् ॥ १ ॥

सर्वं कस्मै न दातव्यं, भक्ताय शुचये मुदा ।
एक-तीर्थं मम देहेस्ति, राधा-रमण-संगतः ॥ २ ॥

कुरु सृष्टिंमिमं धृत्वा, धाता त्रि-जगतो भव ।
संस्थं भव हे शम्भो ! मम् तुल्यो भव हे मुने ॥ ३॥

हे धर्म ! त्वंमिमं धृत्वा, भव साक्षी च कर्मणाम् ।
तपस्याः फल-दाता त्वं, कुरु मम कर-दायकम् ॥ ४॥

ब्रह्माण्ड-पावनाकरणं, कवचस्येदम्: स्वयं ।
ऋषिर्महर्षि-प्रदश्चैव, देवोऽसौ जनार्दन ॥ ५॥

धर्मार्थ-काम-मोक्षाणां, विनियोगः प्रकीर्तितः ।
त्रि-लोक-त्रय-पावनात्, सिद्धिं कवचं लभेत् ॥ ६॥

यो भवेत् सिद्ध-कवचो, मम तुल्यो भवेत्स सः ।
तेजसा सिद्धि-योगेन, ज्ञानिन विक्रमेण च ॥७॥

॥ मूल-कवच-पाठ ॥

सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे।

विनियोगः
ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्ड-पावन-कवचस्य श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेṣu विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यासः
श्रीहरिः ऋषये नमः: शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः: मुखे, श्रीकृष्णो देवतायै नमः: हृदि, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेṣu विनियोगाय नमः: सर्वाङ्गे ॥

॥ मूल कवचः ॥

प्रणवो मे शिरः पातु, नमो रामेश्वराय च ।
भालं पायान् नेत्र-युग्मं, नमो राधेश्वराय च ॥ १॥

कृष्णः पायाद् श्रीर-युग्मं, हे हरे प्राणनाथ च ।
जिघ्रिकां वह्निजायाश्च, कृष्णायैति सर्वदा ॥ २॥

श्रीकृष्णाय स्वाहेति च, कर्णौ पातु पद्द्वयः ।
ह्रीं कृष्णाय नमो वचः, वली पूर्वं मुनि-द्वयम् ॥ ३॥

नमो गोपीनरेशाय, स्कन्धाभ्यामवधारयेत् ।
दन्त-पङ्क्तिमष्ट-युग्मं, नमो गोपीश्वराय च ॥ ४॥

ॐ नमो भगवते रास-मण्डलाय स्वाहा ।
स्वयं वक्त्र-स्थली पातु, नमोऽस्तु पोषणाय च ॥ ५॥

ऐं कृष्णाय स्वाहेति च, कक्ष-युग्मं सदा पिबेत् ।
ॐ त्रयोदश स्वाहेति च, कङ्कणं सदा सेवितव्यम् ॥ ६॥

ऊं हरये नमः: इति, पृष्ठं पातु मदोद्भवः ॥
ॐ गोविन्दं-धारिणं, स्वाहा पातु सर्व-शरीरकं ॥ ७॥

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