सुनु लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ।।
राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिं अघात श्रवनामृत जानी ।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा । हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अंतरजामी ।।
उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ।।
अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिंधु कर नीरा ।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं ।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ।।
दो0: रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड ।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड ।। ४९ (क) ।।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ।। ४९ (ख) ।।
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना । ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ।।
निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी । सर्बरूप सब रहित उदासी ।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक । कारन मनुज दनुज कुल घालक ।।
सुनु कपीस लंकापति बीरा । केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ।।
संकुल मकर उरग झष जाती । अति अगाध दुस्तर सब भाँती ।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक । कोटि सिंधु सोषक तव सायक ।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई । बिनय करिअ सागर सन जाई ।।
दो0: प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि ।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ।। ५० ।।
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई । करिअ दैव जौं होइ सहाई ।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा । राम बचन सुनि अति दुख पावा ।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा । सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ।।
कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा । ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई । सिंधु समीप गए रघुराई ।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई । बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए । पाछें रावन दूत पठाए ।।
दो0: सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ।। ५१ ।।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिं आने ।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर । अंग भंग करि पठवहु निसिचर ।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए । बाँधि कटक चहु पास फिराए ।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे ।।
जो हमार हर नासा काना । तेहि कोसलाधीस कै आना ।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए । दया लागि हँसि तुरत छोडाए ।।
रावन कर दीजहु यह पाती । लछिमन बचन बाचु कुलघाती ।।
दो0: कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार ।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ।। ५२ ।।
तुरत नाइ लछिमन पद माथा । चले दूत बरनत गुन गाथा ।।
कहत राम जसु लंकाँ आए । रावन चरन सीस तिन्ह नाए ।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता । कहसि न सुक आपनि कुसलाता ।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी । जाहि मृत्यु आई अति नेरी ।।
करत राज लंका सठ त्यागी । होइहि जब कर कीट अभागी ।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई । कठिन काल प्रेरित चलि आई ।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा । भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा ।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी । जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ।।
दो0: की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर ।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ।। ५३ ।।
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें । मानहु कहा क्रोध तजि तैसें ।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा । जातहिं राम तिलक तेहि सारा ।।
रावन दूत हमहि सुनि काना । कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ।।
श्रवन नासिका काटै लागे । राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई । बदन कोटि सत बरनि न जाई ।।
नाना बरन भालु कपि धारी । बिकटानन बिसाल भयकारी ।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा । सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ।।
अमित नाम भट कठिन कराला । अमित नाग बल बिपुल बिसाला ।।