एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा । आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा । जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए । समाचार सब ताहि सुनाए ।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । आवा मिलन दसानन भाई ।।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा । कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ।।
जानि न जाइ निसाचर माया । कामरूप केहि कारन आया ।।
भेद हमार लेन सठ आवा । राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी । मम पन सरनागत भयहारी ।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना । सरनागत बच्छल भगवाना ।।


दो0: सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।। ४३ ।।


कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।
भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ।।
जौं सभीत आवा सरनाई । रखिहउँ ताहि प्रान की नाई ।।


दो0: उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ।। ४४ ।।


सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता । नयनानंद दान के दाता ।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी । रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ।।
नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ।।
सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ।।


दो0: श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।। ४५ ।।


अस कहि करत दंडवत देखा । तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भयहारी ।।
कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती । अति नय निपुन न भाव अनीती ।।
बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ।।
अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ।।


दो0: तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।। ४६ ।।


तब लगि हृदयँ बसत खल नाना । लोभ मोह मच्छर मद माना ।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा । धरें चाप सायक कटि भाथा ।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी । राग द्वेष उलूक सुखकारी ।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ।।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे । देखि राम पद कमल तुम्हारे ।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला । ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ । सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा । तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ।।


दो0: अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ।। ४७ ।।


सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवे सभय सरन तकि मोही ।।
तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ।।
जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ।।
सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।।


दो0: सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम ।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।। ४८ ।।