सुनि सुत बध लंकेस रिसाना । पठएसि मेघनाद बलवाना ।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ।।
कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ।।
अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ।।
रहे महाभट ताके संगा । गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ।।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई ।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया ।।
दो0: ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार ।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ।। १९ ।।
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा ।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभाँ सब आए ।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ।।
देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ।।
दो0: कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद ।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ।। २० ।।
कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहिं के बल घालेहि बन खीसा ।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया । पाइ जासु बल बिरचित माया ।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ।।
जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता । तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता ।।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा ।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली । बधे सकल अतुलित बलसाली ।।
दो0: जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ।। २१ ।।
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ।।
समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे ।।
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ।।
जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै ।।
दो0: प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ।। २२ ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम्ह करहू ।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका । तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी । सब भूषण भूषित बर नारी ।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं ।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि राम कर द्रोही ।।
दो0: मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ।। २३ ।।
जदपि कहि कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ।।
बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ।।
मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ।।
उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ।।
सुनत निसाचर मारन धाए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ।।
नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोध न मारिअ दूता ।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्र भल भाई ।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर ।।