पूँछहीन बानर तहँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई । देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई ।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ।।
जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ।।
रहा न नगर बसन घृत तेला । बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी । नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ।।
पावक जरत देखि हनुमंता । भयउ परम लघु रुप तुरंता ।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भई सभीत निसाचर नारीं ।।


दो0: हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ।। २५ ।।


देह बिसाल परम हरुआई । मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहि अवसर को हमहि उबारा ।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ।।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं । एक बिभीषन कर गृह नाहीं ।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ।।
उलटि पलटि लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ।।


दो0: पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ।। २६ ।।


मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना ।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ।।


दो0: जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह ।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ।। २७ ।।


चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा । सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ।।
मिले सकल अति भए सुखारी । तलफत मीन पाव जिमि बारी ।।
चले हरषि रघुनायक पासा । पूँछत कहत नवल इतिहासा ।।
तब मधुबन भीतर सब आए । अंगद संमत मधु फल खाए ।।
रखवारे जब बरजन लागे । मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ।।


दो0: जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज ।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ।। २८ ।।


जौं न होति सीता सुधि पाई । मधुबन के फल सकहिं कि खाई ।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा । आइ गए कपि सहित समाजा ।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा । मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी । राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना । राखे सकल कपिन्ह के प्राना ।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ । कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष बिसेषा ।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई । परे सकल कपि चरनन्हि जाई ।।


दो0: प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज ।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ।। २९ ।।


जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर । तासु सुजसु त्रेलोक उजागर ।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू ।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ।।
पवनतनय के चरित सुहाए । जामवंत रघुपतिहि सुनाए ।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्वप्रान की ।।


दो0: नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ।। ३० ।।