Krishna Janmashtami 2026

Krishna Janmashtami, the birth anniversary of Lord Krishna, the eighth avatar of Vishnu, falls on Friday, 4 September 2026, celebrated by most households and the Smarta tradition, while ISKCON and Vaishnava temples observe it on Saturday, 5 September 2026, since it aligns with the Rohini Nakshatra at sunrise; the Ashtami Tithi begins around 10:48 AM on 4 September and ends around 11:23 AM on 5 September, with the most auspicious Nishita Puja Muhurat falling between roughly 11:57 PM and 12:43 AM. According to Hindu mythology, Krishna was born at midnight in a Mathura prison cell to Devaki and Vasudeva to end the tyranny of the demon king Kansa, and devotees mark the day with fasting, midnight puja involving the ceremonial bathing (abhishek) of the Bal Gopal idol, bhajans, and grand celebrations at temples in Mathura and Vrindavan, alongside the popular Dahi Handi festivities in Maharashtra and Gujarat.


भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी, हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और भव्य त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में मनाया जाता है। इस लेख में जानिए जन्माष्टमी 2026 की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और मथुरा-वृंदावन में होने वाले भव्य आयोजनों की पूरी जानकारी।

जन्माष्टमी 2026 कब है?

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, इसलिए हर साल इसी तिथि और नक्षत्र के संयोग को देखकर जन्माष्टमी की तारीख तय होती है। वर्ष 2026 में यह पर्व दो दिन मनाया जाएगा:

  • स्मार्त संप्रदाय (गृहस्थ परिवार): शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 — जब अष्टमी तिथि मध्यरात्रि में व्याप्त रहेगी।
  • वैष्णव संप्रदाय (इस्कॉन एवं मंदिर परंपरा): शनिवार, 5 सितंबर 2026 — जब सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र के साथ मौजूद रहेगी।

अधिकांश घरों और सामान्य परंपरा में 4 सितंबर 2026 को ही जन्माष्टमी मनाई जाएगी, जबकि इस्कॉन तथा कुछ वैष्णव मंदिर 5 सितंबर को उत्सव मनाएंगे।

भगवान श्री कृष्ण की पूजा निमित्त समस्त मंत्र एवं स्तोत्र के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

शुभ मुहूर्त (4 सितंबर 2026)

अनुष्ठानसमय
अष्टमी तिथि प्रारंभ4 सितंबर, सुबह लगभग 10:48 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त5 सितंबर, सुबह लगभग 11:23 बजे
रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ4 सितंबर, मध्यरात्रि लगभग 12:29 बजे
रोहिणी नक्षत्र समाप्त4 सितंबर, रात लगभग 11:04 बजे
निशिता पूजा मुहूर्त (सबसे शुभ)रात्रि लगभग 11:57 बजे से 12:43 बजे तक
पारण (व्रत खोलने) का समय5 सितंबर, प्रातः अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद

(नोट: पंचांग भेद के कारण अलग-अलग स्रोतों में समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।)

जन्माष्टमी का महत्व और पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब धरती पर अत्याचार और अधर्म चरम पर पहुंच गया, तब मथुरा के राजा कंस के अत्याचारों से जनता त्रस्त थी। कंस को आकाशवाणी से पता चला था कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसका वध करेगी। इस भय से उसने देवकी और उसके पति वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनकी संतानों की हत्या करता रहा।

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, ठीक मध्यरात्रि में, देवकी के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया। वासुदेव जी चमत्कारिक रूप से बालक को यमुना पार करके गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माता के घर छोड़ आए। यहीं से श्रीकृष्ण का बाल्यकाल शुरू हुआ, जिन्होंने आगे चलकर कंस का वध कर धर्म की स्थापना की और महाभारत में अर्जुन को गीता का उपदेश देकर कर्मयोग व भक्तियोग का मार्ग दिखाया।

जन्माष्टमी व्रत रखने और विधिपूर्वक पूजा करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है।

जन्माष्टमी पूजा विधि

  1. व्रत संकल्प: सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान कृष्ण के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  2. दिनभर उपवास: पूरे दिन निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखें (स्वास्थ्य अनुसार)।
  3. मंदिर और घर की सजावट: घर के मंदिर तथा बाल गोपाल के झूले को फूलों, तोरण और रंगोली से सजाएं।
  4. लड्डू गोपाल का अभिषेक: रात्रि 12 बजे (निशिता मुहूर्त में) बाल गोपाल की मूर्ति को दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से पंचामृत स्नान कराएं, फिर स्वच्छ जल से स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं।
  5. झूला झुलाना: बाल गोपाल को झूले में विराजमान कर धीरे-धीरे झुलाएं और शंख व घंटी बजाकर जन्मोत्सव मनाएं।
  6. आरती और भोग: धूप-दीप जलाकर आरती करें और माखन-मिश्री, पंचामृत तथा विभिन्न फलों का भोग अर्पित करें।
  7. मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा “हरे कृष्ण महामंत्र” का जाप करें।
  8. पारण: अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।

व्रत में क्या खाएं, क्या न खाएं

खा सकते हैं: फल (केला, सेब, पपीता), दूध, दही, मक्खन, छाछ, साबूदाना, कुट्टू व सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक।

वर्जित है: अन्न (चावल, गेहूं, दाल), प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन।

मथुरा-वृंदावन में जन्माष्टमी उत्सव

भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और उनकी लीलास्थली वृंदावन में जन्माष्टमी सबसे भव्य रूप से मनाई जाती है। द्वारकाधीश मंदिर, बांके बिहारी मंदिर, इस्कॉन मंदिर वृंदावन और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में लाखों श्रद्धालु मध्यरात्रि के जन्मोत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, भजन-कीर्तन होते हैं और ठीक 12 बजे शंखनाद के साथ बाल गोपाल का जन्म मनाया जाता है।

इसके अलावा महाराष्ट्र और गुजरात में दही हांडी का उत्सव भी बहुत लोकप्रिय है, जिसमें युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही से भरी मटकी फोड़ती है — यह श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की याद दिलाता है।

निष्कर्ष

कृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और प्रेम की विजय का उत्सव है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 4 और 5 सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। विधिपूर्वक व्रत-पूजा कर भक्त भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

हरे कृष्ण! जय श्रीकृष्ण!


नोट: पूजा मुहूर्त स्थान और पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं, कृपया अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।