
Holi 2027, the vibrant festival of colors marking the triumph of good over evil and the arrival of spring, is celebrated in two stages in 2027: Holika Dahan (the bonfire ritual) falls on Sunday, 21 March, during the auspicious Pradosh Kaal window of roughly 6:33 PM to 8:55 PM, followed by Rangwali Holi (Dhulandi) on Monday, 22 March.
होली, रंगों और उमंग का पर्व, बुराई पर अच्छाई की जीत तथा वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। यह पर्व दो चरणों में मनाया जाता है — पहले दिन होलिका दहन (छोटी होली) और अगले दिन रंगवाली होली (धुलंडी)। इस लेख में जानिए होली 2027 की सही तारीख, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा और पूजा विधि की संपूर्ण जानकारी।
होली 2027 कब है?
फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की संध्या को होलिका दहन किया जाता है, और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगवाली होली खेली जाती है। वर्ष 2027 में:
- होलिका दहन (छोटी होली): रविवार, 21 मार्च 2027
- रंगवाली होली (धुलंडी): सोमवार, 22 मार्च 2027
शुभ मुहूर्त
| अनुष्ठान | तारीख / समय |
|---|---|
| होलिका दहन मुहूर्त (प्रदोष काल) | 21 मार्च 2027, सायं लगभग 6:33 बजे से 8:55 बजे तक |
| पूर्णिमा तिथि | फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, 21 मार्च 2027 |
| रंगवाली होली | 22 मार्च 2027 (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) |
(नोट: होलिका दहन सदैव भद्रा काल के बाद प्रदोष काल में किया जाना चाहिए। भद्रा को अशुभ माना जाता है, इसलिए दहन से पहले अपने स्थानीय पंचांग में भद्रा की स्थिति अवश्य देख लें। समय शहर और पंचांग भेद के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।)
होली का महत्व और पौराणिक कथा
होली से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा भक्त प्रह्लाद और होलिका की है। हिरण्यकश्यप नामक एक अहंकारी राक्षस राजा स्वयं को भगवान मानने लगा था और चाहता था कि प्रजा भी उसकी पूजा करे। परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और पिता की आज्ञा मानने से इनकार कर दिया। क्रोधित हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती। होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, परंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है, जो अहंकार, बुराई और नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है।
होली का एक और पहलू भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की प्रेम-लीला से भी जुड़ा है। ब्रज क्षेत्र — मथुरा, वृंदावन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव — में होली विशेष रूप से भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं और राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित है, जहां विश्वप्रसिद्ध लठमार होली भी खेली जाती है।
होलिका दहन पूजा विधि
- सामग्री एकत्रित करना: होलिका दहन से कई दिन पहले लकड़ियां, उपले (गोबर के कंडे) और अन्य दहनशील सामग्री एकत्रित कर चौराहे या खुले स्थान पर ढेर लगाया जाता है।
- होलिका पूजन: दहन से पहले होलिका की पूजा रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, गुड़, नारियल और मूंग-बताशे अर्पित कर की जाती है।
- परिक्रमा: पूजा के बाद होलिका के चारों ओर 3, 5 या 7 बार परिक्रमा की जाती है।
- दहन: शुभ प्रदोष मुहूर्त में, भद्रा काल की समाप्ति के बाद होलिका को अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
- जौ अर्पण: अग्नि में जौ की बालियां भूनकर घर लाई जाती हैं, जिसे समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
- भस्म धारण: अगले दिन होलिका की राख को माथे पर लगाकर नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना की जाती है।
रंगवाली होली कैसे मनाई जाती है
होलिका दहन के अगले दिन सुबह से ही लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर, रंग और पानी से भरे गुब्बारों से खेलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं। पुराने मनमुटाव भुलाकर गले मिलने की परंपरा है। इस दिन गुजिया, मालपुआ, दही-बड़ा और ठंडाई जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए और बांटे जाते हैं। बिहार में इसे “फगुआ” के नाम से भी जाना जाता है, जहां लोकगीतों और पारंपरिक धुनों के साथ यह पर्व मनाया जाता है।
निष्कर्ष
होली प्रेम, एकता, क्षमा और नई शुरुआत का पर्व है। वर्ष 2027 में होलिका दहन 21 मार्च और रंगवाली होली 22 मार्च को धूमधाम से मनाई जाएगी। इस पर्व के माध्यम से हम बुराई पर अच्छाई की जीत का स्मरण करते हुए जीवन में उमंग, उत्साह और सकारात्मकता का संचार करते हैं।
होली की हार्दिक शुभकामनाएं!
नोट: पूजा मुहूर्त स्थान और पंचांग के अनुसार बदल सकते हैं, कृपया अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।