कौशिकी वैदिकी देवी सौरी रूपाधिकाऽतिभा।
दिग्वस्त्रा नववस्त्रा च कन्यका कमलोद्भवा॥३१॥
श्रीस्सौम्यलक्षणाऽतीतदुर्गा सूत्रप्रबोधिका।
श्रद्धा मेधा कृतिः प्रज्ञा धारणा कान्तिरेव च॥३२॥
श्रुतिः स्मृतिर्धृतिर्धन्या भूतिरिष्टिर्मनीषिणी।
विरक्तिर्व्यापिनी माया सर्वमायाप्रभञ्जनी॥३३॥
माहेन्द्री मन्त्रिणी सिंही चेन्द्रजालस्वरूपिणी।
अवस्थात्रयनिर्मुक्ता गुणत्रयविवर्जिता॥३४॥
ईषणात्रयनिर्मुक्ता सर्वरोगविवर्जिता।
योगिध्यानान्तगम्या च योगध्यानपरायणा॥३५॥
त्रयीशिखा विशेषज्ञा वेदान्तज्ञानरूपिणी।
भारती कमला भाषा पद्मा पद्मवती कृतिः॥३६॥
गौतमी गोमती गौरी ईशाना हंसवाहनी।
नारायणी प्रभाधारा जाह्नवी शङ्करात्मजा॥३७॥
चित्रघण्टा सुनन्दा श्रीर्मानवी मनुसम्भवा।
स्तम्भिनी क्षोभिणी मारी भ्रामिणी शत्रुमारिणी॥३८॥
मोहिनी द्वेषिणी वीरा अघोरा रुद्ररूपिणी।
रुद्रैकादशिनी पुण्या कल्याणी लाभकारिणी॥३९॥
देवदुर्गा महादुर्गा स्वप्नदुर्गाऽष्टभैरवी।
सूर्यचन्द्राग्निरूपा च ग्रहनक्षत्ररूपिणी॥४०॥
बिन्दुनादकलातीता बिन्दुनादकलात्मिका।
दशवायुजयाकारा कलाषोडशसंयुता॥४१॥
काश्यपी कमलादेवी नादचक्रनिवासिनी।
मृडाधारा स्थिरा गुह्या देविका चक्ररूपिणी॥४२॥
अविद्या शार्वरी भुञ्जा जम्भासुरनिबर्हिणी।
श्रीकाया श्रीकला शुभ्रा कर्मनिर्मूलकारिणी॥४३॥
आदिलक्ष्मीर्गुणाधारा पञ्चब्रह्मात्मिका परा।
श्रुतिर्ब्रह्ममुखावासा सर्वसम्पत्तिरूपिणी॥४४॥
मृतसञ्जीविनी मैत्री कामिनी कामवर्जिता।
निर्वाणमार्गदा देवी हंसिनी काशिका क्षमा॥४५॥
सपर्या गुणिनी भिन्ना निर्गुणा खण्डिताशुभा।
स्वामिनी वेदिनी शक्या शाम्बरी चक्रधारिणी॥४६॥
दण्डिनी मुण्डिनी व्याघ्री शिखिनी सोमसंहतिः।
चिन्तामणिश्चिदानन्दा पञ्चबाणाग्रबोधिन॥४७॥
बाणश्रेणिस्सहस्राक्षी सहस्रभुजपादुक।
सन्ध्यावलिस्त्रिसन्ध्याख्या ब्रह्माण्डमणिभूषणा॥४८॥
वासवी वारुणीसेना कुलिका मन्त्ररञ्जनी।
जितप्राणस्वरूपा च कान्ता काम्यवरप्रदा॥४९॥
मन्त्रब्राह्मणविद्यार्था नादरूपा हविष्मती।
आथर्वणी श्रुतिशून्या कल्पनावर्जिता सती॥५०॥
सत्ताजातिः प्रमाऽमेयाऽप्रमितिः प्राणदा गतिः।
अवर्णा पञ्चवर्णा च सर्वदा भुवनेश्वरी॥५१॥
त्रैलोक्यमोहिनी विद्या सर्वभर्त्री क्षराऽक्षरा।
हिरण्यवर्णा हरिणी सर्वोपद्रवनाशिनी॥५२॥
कैवल्यपदवीरेखा सूर्यमण्डलसंस्थिता।
सोममण्डलमध्यस्था वह्निमण्डलसंस्थिता॥५३॥
वायुमण्डलमध्यस्था व्योममण्डलसंस्थिता।
चक्रिका चक्रमध्यस्था चक्रमार्गप्रवर्तिनी॥५४॥
कोकिलाकुलचक्रेशा पक्षतिः पंक्तिपावनी।
सर्वसिद्धान्तमार्गस्था षड्वर्णावरवर्जिता॥५५॥
शररुद्रहरा हन्त्री सर्वसंहारकारिणी।
पुरुषा पौरुषी तुष्टिस्सर्वतन्त्रप्रसूतिका॥५६॥
अर्धनारीश्वरी देवी सर्वविद्याप्रदायिनी।
भार्गवी याजुषीविद्या सर्वोपनिषदास्थिता॥५७॥
व्योमकेशाखिलप्राणा पञ्चकोशविलक्षणा।
पञ्चकोशात्मिका प्रत्यक्पञ्चब्रह्मात्मिका शिवा॥५८॥
जगज्जराजनित्री च पञ्चकर्मप्रसूतिका।
वाग्देव्याभरणाकारा सर्वकाम्यस्थितस्थितिः॥५९॥
अष्टादशचतुष्षष्ठिपीठिका विद्यया युता।
कालिकाकर्षणश्यामा यक्षिणी किन्नरेश्वरी॥६०॥