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श्री राम जी

श्री राम भुजंग प्रयात स्तोत्रम् / Shri Ram Bhujanga Prayaat Stotram

23 June 2026

विशुद्धं परं सच्चिदानंदरूपं
गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम् ।
महांतं विभांतं गुहांतं गुणांतं
सुखांतं स्वयं धाम रामं प्रपद्ये ॥ १ ॥

शिवं नित्यमेकं विभुं तारकाख्यं
सुखाकारमाकारशून्यं सुमान्यम् ।
महेशं कलेशं सुरेशं परेशं
नरेशं निरीशं महीशं प्रपद्ये ॥ २ ॥

यदावर्णयत्कर्णमूलेऽंतकाले
शिवो राम रामेति रामेति काश्याम् ।
तदेकं परं तारकब्रह्मरूपं
भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहम् ॥ ३ ॥

महारत्नपीठे शुभे कल्पमूले
सुखासीनमादित्यकोटिप्रकाशम् ।
सदा जानकीलक्ष्मणोपेतमेकं
सदा रामचंद्रं भजेऽहं भजेऽहम् ॥ ४ ॥

क्वणद्रत्नमंजीरपादारविंदं
लसन्मेखलाचारुपीतांबराढ्यम् ।
महारत्नहारोल्लसत्कौस्तुभांगं
नदच्चंचरीमंजरीलोलमालम् ॥ ५ ॥

लसच्चंद्रिकास्मेरशोणाधराभं
समुद्यत्पतंगेंदुकोटिप्रकाशम् ।
नमद्ब्रह्मरुद्रादिकोटीररत्न
स्फुरत्कांतिनीराजनाराधितांघ्रिम् ॥ ६ ॥

पुरः प्रांजलीनांजनेयादिभक्तान्
स्वचिन्मुद्रया भद्रया बोधयंतम् ।
भजेऽहं भजेऽहं सदा रामचंद्रं
त्वदन्यं न मन्ये न मन्ये न मन्ये ॥ ७ ॥

यदा मत्समीपं कृतांतः समेत्य
प्रचंडप्रकोपैर्भटैर्भीषयेन्माम् ।
तदाविष्करोषि त्वदीयं स्वरूपं
सदापत्प्रणाशं सकोदंडबाणम् ॥ ८ ॥

निजे मानसे मंदिरे सन्निधेहि
प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचंद्र ।
ससौमित्रिणा कैकयीनंदनेन
स्वशक्त्यानुभक्त्या च संसेव्यमान ॥ ९ ॥

स्वभक्ताग्रगण्यैः कपीशैर्महीशै-
-रनीकैरनेकैश्च राम प्रसीद ।
नमस्ते नमोऽस्त्वीश राम प्रसीद
प्रशाधि प्रशाधि प्रकाशं प्रभो माम् ॥ १० ॥

त्वमेवासि दैवं परं मे यदेकं
सुचैतन्यमेतत्त्वदन्यं न मन्ये ।
यतोऽभूदमेयं वियद्वायुतेजो
जलोर्व्यादिकार्यं चरं चाचरं च ॥ ११ ॥

नमः सच्चिदानंदरूपाय तस्मै
नमो देवदेवाय रामाय तुभ्यम् ।
नमो जानकीजीवितेशाय तुभ्यं
नमः पुंडरीकायताक्षाय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

नमो भक्तियुक्तानुरक्ताय तुभ्यं
नमः पुण्यपुंजैकलभ्याय तुभ्यम् ।
नमो वेदवेद्याय चाद्याय पुंसे
नमः सुंदरायेंदिरावल्लभाय ॥ १३ ॥

नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वहर्त्रे
नमो विश्वभोक्त्रे नमो विश्वमात्रे ।
नमो विश्वनेत्रे नमो विश्वजेत्रे
नमो विश्वपित्रे नमो विश्वमात्रे ॥ १४ ॥

नमस्ते नमस्ते समस्तप्रपंच-
-प्रभोगप्रयोगप्रमाणप्रवीण ।
मदीयं मनस्त्वत्पदद्वंद्वसेवां
विधातुं प्रवृत्तं सुचैतन्यसिद्ध्यै ॥ १५ ॥

शिलापि त्वदंघ्रिक्षमासंगिरेणु
प्रसादाद्धि चैतन्यमाधत्त राम ।
नरस्त्वत्पदद्वंद्वसेवाविधाना-
-त्सुचैतन्यमेतीति किं चित्रमत्र ॥ १६ ॥

पवित्रं चरित्रं विचित्रं त्वदीयं
नरा ये स्मरंत्यन्वहं रामचंद्र ।
भवंतं भवांतं भरंतं भजंतो
लभंते कृतांतं न पश्यंत्यतोऽंते ॥ १७ ॥

स पुण्यः स गण्यः शरण्यो ममायं
नरो वेद यो देवचूडामणिं त्वाम् ।
सदाकारमेकं चिदानंदरूपं
मनोवागगम्यं परं धाम राम ॥ १८ ॥

प्रचंडप्रतापप्रभावाभिभूत-
-प्रभूतारिवीर प्रभो रामचंद्र ।
बलं ते कथं वर्ण्यतेऽतीव बाल्ये
यतोऽखंडि चंडीशकोदंडदंडम् ॥ १९ ॥

दशग्रीवमुग्रं सपुत्रं समित्रं
सरिद्दुर्गमध्यस्थरक्षोगणेशम् ।
भवंतं विना राम वीरो नरो वा
सुरो वाऽमरो वा जयेत्कस्त्रिलोक्याम् ॥ २० ॥

सदा राम रामेति रामामृतं ते
सदाराममानंदनिष्यंदकंदम् ।
पिबंतं नमंतं सुदंतं हसंतं
हनूमंतमंतर्भजे तं नितांतम् ॥ २१ ॥

सदा राम रामेति रामामृतं ते
सदाराममानंदनिष्यंदकंदम् ।
पिबन्नन्वहं नन्वहं नैव मृत्यो-
-र्बिभेमि प्रसादादसादात्तवैव ॥ २२ ॥

असीतासमेतैरकोदंडभूषै-
-रसौमित्रिवंद्यैरचंडप्रतापैः ।
अलंकेशकालैरसुग्रीवमित्रै-
-ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥ २३ ॥

अवीरासनस्थैरचिन्मुद्रिकाढ्यै-
-रभक्तांजनेयादितत्त्वप्रकाशैः ।
अमंदारमूलैरमंदारमालै-
-ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥ २४ ॥

असिंधुप्रकोपैरवंद्यप्रतापै-
-रबंधुप्रयाणैरमंदस्मिताढ्यैः ।
अदंडप्रवासैरखंडप्रबोधै-
-ररामाभिधेयैरलं दैवतैर्नः ॥ २५ ॥

हरे राम सीतापते रावणारे
खरारे मुरारेऽसुरारे परेति ।
लपंतं नयंतं सदाकालमेवं
समालोकयालोकयाशेषबंधो ॥ २६ ॥

नमस्ते सुमित्रासुपुत्राभिवंद्य
नमस्ते सदा कैकयीनंदनेड्य ।
नमस्ते सदा वानराधीशवंद्य
नमस्ते नमस्ते सदा रामचंद्र ॥ २७ ॥

प्रसीद प्रसीद प्रचंडप्रताप
प्रसीद प्रसीद प्रचंडारिकाल ।
प्रसीद प्रसीद प्रपन्नानुकंपिन्
प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचंद्र ॥ २८ ॥

भुजंगप्रयातं परं वेदसारं
मुदा रामचंद्रस्य भक्त्या च नित्यम् ।
पठन्संततं चिंतयन्स्वांतरंगे
स एव स्वयं रामचंद्रः स धन्यः ॥ २९ ॥

इति श्रीमच्छंकराचार्य कृतं श्री राम भुजंगप्रयात स्तोत्रम् ।

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