सुबह के समय उच्चारित किए जाने वाले संस्कृत मंत्र न केवल मानसिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि दिन की सकारात्मक शुरुआत में भी सहायक होते हैं। इन मंत्रों के जाप से ऊर्जा, एकाग्रता और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। यहां कुछ महत्वपूर्ण प्रातःकालीन मंत्र दिए गए हैं, जो आपके दिन को शुभ और आनंदमय बनाएंगे।
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
भावार्थ : हे श्री गणेश, दुष्टों का नाश करने वाले, शक्तिशाली, एक हजार सूर्यों के समान तेज वाले। मेरे सभी कार्य बिना किसी बाधा के संपन्न हों।
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरांतकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥
भावार्थ : ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, श्रीविष्णु पालक और राक्षस मूर के संहारक, शिव संहारक और राक्षस त्रिपुर के संहारक, और नौ ब्रह्मांडीय निकाय सूर्य (सूर्य), चंद्र (चंद्रमा), मंगल (मंगल), बुद्ध (बुध), गुरु (बृहस्पति), शुक्र (शुक्र), शनि (शनि), राहु (नेपच्यून) और केतु (प्लूटो) मेरी सुबह को शुभ बनाते हैं ।
कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविंद: प्रभाते करदर्शनम् ॥
भावार्थ : हथेली के उँगलियों पर (देवी) श्री लक्ष्मीदेवी का वास है, हथेली का मध्य भाग (देवी) श्री सरस्वतीदेवी का तथा हथेली का आधार देवता श्री गोविन्द का है; इसलिए सुबह उठकर तुरंत हथेलियों को देखना चाहिए।
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥
भावार्थ : हे देवी पृथ्वी, आप अपनी पोशाक के रूप में समुद्र और अपने स्तनों के रूप में पहाड़ों से सुशोभित हैं; आप श्रीविष्णु की पत्नी हैं। मैं आपको नमन करता हूं। कृपया मुझे अपने पैरों से आप पर चलने के लिए क्षमा करें।
नास्ति मातृसमा छाय नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा ॥
भावार्थ : माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं ।
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत् ॥
भावार्थ : मनुष्य के लिये उसकी माता सभी तीर्थों के समान तथा पिता सभी देवताओं के समान पूजनीय होते है। अतः उसका यह परम् कर्तव्य है कि वह् उनका अच्छे से आदर और सेवा करे ।
या देवी स्तुयते नित्यं विबुधैर्वेदपरागै: ।
सा मे वसतु जिह्रारो ब्रह्मरूपा सरस्वती ॥
भावार्थ : ज्ञान की देवी माँ सरस्वती जिसकी जिव्हा पर सारे श्लोकों का सार है जो बुद्धि की देवी कही जाती है और जो ब्रह्म देव की पत्नी है ऐसी माँ का वास मेरे अन्दर सदैव रहे ऐसी कामना है ।
नमस्तेस्तु महामायें श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शंख्चक्ररादाह्स्ते महालक्ष्मी नमस्तु ते ॥
भावार्थ : माँ लक्ष्मी जो शक्ति की देवी है जो धन की देवी है जो समस्त देवताओ द्वारा पूजी जाती है जिनके हाथो में शंख और चक्र है ऐसी माँ लक्ष्मी को मेरा प्रणाम है ।
निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥
भावार्थ : जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ ।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥
भावार्थ : अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों, और मङ्गलोंकी करने वाली सरस्वतीजी और गणेश जी की में वन्दना करता हूँ ।
मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्यः स्तोतारं ते शतक्रतो ।
सकृत्सु नो मघवन्निन्द्र मृळयाधा पितेव नो भव ॥
भावार्थ : हे इन्द्र, जिस प्रकार चूहे आपके भक्त होते हुए भी वस्त्रों को खा जाते हैं, उसी प्रकार मेरे मानसिक रोग मुझे व्याकुल कर रहे हैं। स्वामी इंद्र, एक बार मुझ पर अपनी कृपा बरसाओ, और पिता के समान मेरी रक्षा करो।
यो अन्धो यः पुनःसरो भगो वृक्षेष्वाहितः ।
तेन मा भगिनं कृण्वप द्रान्त्वरातयः ॥
भावार्थ : हे ईश्वर, ऐश्वर्य, शक्ति, शक्ति, सफलता और जीवन को स्थिर करने के लिए आपके पास जो अनंत और स्थायी चैतन्य है, वह पेड़ों में भी मौजूद है। इस चैतन्य के कारण ही वृक्ष बार-बार शाखाओं को छँटाने पर भी हरा-भरा बना रहता है। कृपया मुझे वही ऐश्वर्य, शक्ति और शक्ति प्रदान करें जिससे मैं अपने शत्रु को परास्त कर सकूं और अपने जीवन की विपत्तियों को दूर कर सकूं।
शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपद: ।
शत्रुबुध्दिविनाशाय दीपजोतिर्नामोस्तुते ॥
भावार्थ : ऐसे देवता को प्रणाम करती हूँ ,जो कल्याण करता है, रोग मुक्त रखता है, धन सम्पदा देता हैं, जो विपरीत बुध्दि का नाश करके मुझे सद मार्ग दिखाता हैं, ऐसी दीव्य ज्योति को मेरा परम नम: ।
सूर्य संवेदना पुष्पे:, दीप्ति कारुण्यगंधने ।
लब्ध्वा शुभम् नववर्षेअस्मिन् कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ॥
भावार्थ : जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, पुष्प देता है, संवेदना देता है और हमें दया भाव सिखाता है उसी तरह यह नव वर्ष हमें हर पल ज्ञान दे और हमारा हर दिन, हर पल मंगलमय हो ।
सरस्वती नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणी ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥
भावार्थ : ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को मेरा नमस्कार, वर दायिनी माँ भगवती को मेरा प्रणाम । अपनी विद्या आरम्भ करने से पूर्व आपका नमन करती हूँ , मुझ पर अपनी सिद्धि की कृपा बनाये रखें ।
या देवी सर्वभूतेशु, शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तसयै, नमस्तसयै, नमस्तसयै नमो नम: ॥
भावार्थ : देवी सभी जगह व्याप्त है जिसमे सम्पूर्ण जगत की शक्ति निहित है ऐसी माँ भगवती को मेरा प्रणाम ।
ॐ असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय, मॄत्योर्मा अमॄतं गमय ॥
भावार्थ : हे प्रभु! असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता की ओर मेरी गति हो ।
या कुंदेंदुतुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ॥
भावार्थ : जो विद्या देवी कुंद के पुष्प, शीतल चन्द्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की है और जिन्होंने श्वेत वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए है, जिनके हाथ में वीणा शोभायमान है और जो श्वेत कमल पर विराजित हैं तथा ब्रह्मा,विष्णु और महेश और सभी देवता जिनकी नित्य वन्दना करते है वही अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाली माँ भगवती हमारी रक्षा करें ।
